*हवा के शब्दांश
बिना भय के बढती औरत
कितनी विलक्षण लगती है
बदलियों संग उड़ानें भरती हैं ख्वाहिशें उसकी
चाँद को देख भूल उठती है अपनी उदासी
सितारों में छिटका खत्म कर देती है गलतफहमी अपनी
कितनी विलक्षण लगती है
बदलियों संग उड़ानें भरती हैं ख्वाहिशें उसकी
चाँद को देख भूल उठती है अपनी उदासी
सितारों में छिटका खत्म कर देती है गलतफहमी अपनी
जमीन पर घिसट कर चलती औरत
कीचड़ में लिथड़ा होता है उसका नसीब
लहरों पर पड़ी रेशम की तरह गल जाते हैं सपने सारे
रेत में, दफ़न कर देते हैं उसे उसके भय
और गुलाबी रंगत वाली त्वचा
नारंगी और चैरी के कॉकटेल की तरह हो जाती है बैजनी
कीचड़ में लिथड़ा होता है उसका नसीब
लहरों पर पड़ी रेशम की तरह गल जाते हैं सपने सारे
रेत में, दफ़न कर देते हैं उसे उसके भय
और गुलाबी रंगत वाली त्वचा
नारंगी और चैरी के कॉकटेल की तरह हो जाती है बैजनी
हवा में झोंके की तरह उडती औरत
आसमानी रंग में रंगी होती हैं उसकी पलकें
नारंगी के फूलों की सुगंध से सराबोर होती हैं उसकी साँसें
सितारों की टोलियों में केसर सी घुली वह
जंगल के तूफानी कोहरे में उलझी होती है पत्तियों के बीच कहीं
आसमानी रंग में रंगी होती हैं उसकी पलकें
नारंगी के फूलों की सुगंध से सराबोर होती हैं उसकी साँसें
सितारों की टोलियों में केसर सी घुली वह
जंगल के तूफानी कोहरे में उलझी होती है पत्तियों के बीच कहीं
सफ़ेद कैनवस पर
कूची की एक छुवन भर से ही
मानो जी उठती है औरत
कागज और रंग मिलते ही फूट उठते हैं उसके अहसास
हवा पर लिखे शब्दांशों को समझने की कोशिश करती
बुत बनी रहती है वह बरसो-बरस
कूची की एक छुवन भर से ही
मानो जी उठती है औरत
कागज और रंग मिलते ही फूट उठते हैं उसके अहसास
हवा पर लिखे शब्दांशों को समझने की कोशिश करती
बुत बनी रहती है वह बरसो-बरस
बह उठती है वह
आंसुओं के संग कभी लहरों के
तो कभी गर्मियों की बारिश के संग
कागज के रूप में एक साथी पाकर
तोहफ़े में खुद को देती है एक पन्ना
उफनती दवात में उसे नज़र आता है
एक भंवर उठता हुआ
आंसुओं के संग कभी लहरों के
तो कभी गर्मियों की बारिश के संग
कागज के रूप में एक साथी पाकर
तोहफ़े में खुद को देती है एक पन्ना
उफनती दवात में उसे नज़र आता है
एक भंवर उठता हुआ
कुदरत से मिला
असीम अनुराग स्पन्दित करता रहता है उसे
उससे भी आगे उछाले मारता है उसमें लाड-दुलार का सोता
गुम हुईं चिट्ठियाँ दौड़ती रहती हैं उसकी नसों में
बोध तो जैसे चिपका रहता है उसकी त्वचा के नीचे
वो औरत जिसे किसी का इंतज़ार नही
सुनती रहती है अपनी थरथराती धडकनों को
असीम अनुराग स्पन्दित करता रहता है उसे
उससे भी आगे उछाले मारता है उसमें लाड-दुलार का सोता
गुम हुईं चिट्ठियाँ दौड़ती रहती हैं उसकी नसों में
बोध तो जैसे चिपका रहता है उसकी त्वचा के नीचे
वो औरत जिसे किसी का इंतज़ार नही
सुनती रहती है अपनी थरथराती धडकनों को
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