शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

*एक मर्तबा फिर

अनसुना करते हुए
दूर से आती  
उस शफ्फाफ झरने की आवाज़  
मुड-मुड कर देख रहीं आंखों पर
रखती हुई अपनी हथेलियाँ,
बेशुमार दरख्तों वाले उस घने जंगल में
कुलांचे भरना भूल गये मृग छौने सी
उन तमाम कंकरों
नुकीले तिनकों की टीस भूल
रबाब से गूंजती दर्द भरी
अपनी उन्ही बंदिशों को सुनने चली हूँ

एक मर्तबा फिर !



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भीड़ में चेहरे नहीं दिखते
दिखते हैं सिर से भिडे सिर्फ़ काले सिर
अबूझ रहस्यों और तिलिस्म से भरे
समवेत स्वर में अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाते
क्या कुछ आवाजें सिर्फ़ सुनाये जाने के लिए होती हैं
सुने जाने के लिए नहीं ?
आवाजों के शोर में अकुलाती
आवाजें भी सुने जाने की दरकार रखती हैं

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अलसुबह
दीवारों पर सिर टिकाये
मुंडेरों की परछाइयां
और घुलने लगती हैं
जमी हुई परतें खारेपन की
बह निकलते हैं
अलग अलग रंग
एक ही पोर्ट्रेट पर
पनीले मगर गहरे !
ऐसे ही कई पोट्रेट में
रंग भरता है चित्रकार
एक बार फिर से 
खाली हो जाने के लिए 




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*कुछ कहो 

बहुत हुईं 
दुनिया की रस्म और रंजो-गम की बातें
आज़ हो सके तो कहो ..
इससे अलाहेदा कुछ कहो...
धुंध में लिपटे
ये सुबहो-शाम
ये ज़मीं ये दरख्त
ऐसे में जीने की वज़ह ढूंढते
फडफडाते परिंदों के बारे में कुछ कहो
कब तक करोगे इंतज़ार
सूरज निकलने का ?
सुराखों से जो झाँक रही
उन कोंपलों के बारे में कुछ कहो.
देखो, हथेलियों में होगा
अभी भी नक़्शे-गुल
आज़ बाक़ी बचे उस रंग
उस महक के बारे में कुछ कहो
वक्त के चेहरे पर
चढ़ी जाती है मायूसी की परत
सुनो, आज़ इन कदमों की
टूट गयी लय के बारे में कुछ कहो.
वही रंग, फितरतें वही
बेमानी रवायतों की फेहरिस्त भी वही
रास्ते पर झूमते गाते
अलमस्त फ़क़ीर के बारे में कुछ कहो
नामुराद जिए जाना भी
कैसी आदत है?
आज़ गुमशुदा जिंदगी के उस साज़ 
उस सरगम के बारे में कुछ कहो ...


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* इससे पहले कि
और अंततः 
नही शांत हुई
तुम्हारे गुनगुनाये गीतों से
नन्हके के पेट में सुलगती आग
और न ही वे दे सके
फटी गुदड़ी में ठण्ड से कांपते
रात रात भर खांसते बाबा को
घड़ी भर नींद
तो खूबसूरत शब्दों में ढले
सावन के झूले, नैहर, कुओं और
काँटों से लहूलुहान तितली की पीड़ा पर
तुम्हारे वे तमाम गीत किस काम के ?
तुम्हारे गीतों से झंकृत
राग रागनियाँ
बेशक कुछ पलों के लिए
सपनों की दुनिया में खींच ले जाती हैं मुझे
कभी शब्दों से छलकती वेदना पर
गिरा करके कुछ आँसू
निभा जाती हैं चलन ये आँखें भी
पर अगले ही पल
मेरी सम्पूर्ण चेतना झकझोरते
उभरने लगते हैं एक एक कर कई बुझते चेहरे
और मेरे पांवों तले जमीन
कुछ और धसकती मालूम होती है मुझे
इससे पहले कि 
सुनाई पड़ती ये धुने
मुझे बहरा बेसुरा और तमाशाई बना दे
इससे पहले कि
इन गहरे अक्षरों में आकार लेते दैत्य
समूची संवेदनाएँ लील जाए
गढ़नी होंगी कुछ नयी परिभाषाएँ
जो गुनगुनायी जा सके आँखों से
हाँ, बुझ चुकी पथराई आँखों से भी.....


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