* *सहानुभूति
सहानुभूति
गुलाबी पंखों वाले
फ्रिल लगे बड़े से सफ़ेद हैट के नीचे
अपने नुकीले दांत
और घाघ नज़रों को छिपाए
किसी बहुरूपिये सी
गुलाबी पंखों वाले
फ्रिल लगे बड़े से सफ़ेद हैट के नीचे
अपने नुकीले दांत
और घाघ नज़रों को छिपाए
किसी बहुरूपिये सी
भूख से बिलबिलाती
सिर्फ़ दिमाग के तंतुओं की शौक़ीन
छटपटाती ढूंढती फिरती है हर घडी
इंसानों के दिमाग
सिर्फ़ दिमाग के तंतुओं की शौक़ीन
छटपटाती ढूंढती फिरती है हर घडी
इंसानों के दिमाग
और
किसी शिकार के मिलते ही
हलक में भींच कर रखती है
देर तलक
फ़िर
मरा जान गटक जाती है
किसी घड़ियाल सी
एक झटके में समूचा दिमाग
किसी शिकार के मिलते ही
हलक में भींच कर रखती है
देर तलक
फ़िर
मरा जान गटक जाती है
किसी घड़ियाल सी
एक झटके में समूचा दिमाग
और
ताज्जुब यह कि
बगैर दिमाग के
जीवित रहने का भरम रख
बरसों बरस
मुस्कुराता रहता है इंसान
बगैर दिमाग के
जीवित रहने का भरम रख
बरसों बरस
मुस्कुराता रहता है इंसान
*ऊब आने का यह मुकम्मल वक़्त
ऊब थी,
वो तो एक न एक दिन आनी ही थी
तो तोड़ दिए हमने
मिट्टी के खिलौने
कब तक खेलते रहते उनसे
आखिर वक्त के साथ चलना था
पुराने को छोड़ कुछ नया जो करना था
और अब गढ़ लिया अज़ब गज़ब का नया !
तो नन्हे भोलू के चेहरे से
मुस्कान हटाकर
पेड़ की छाँव तले रात गुजारते
इक पगले को दे दी गयी,
अब खाकी वर्दी पहने सिपाही
बंदूक लिए तो नज़र आता है
पर ट्रिगर उसके हाथों में नहीं
सफ़ेद पोशीदा पर्दों के पीछे बैठे
सेठ करोरीमल के हाथों में दे दिया गया
और धीरे धीरे ये खेल
खिलौनों के साथ नहीं
इन्सानों के साथ खेले जाने लगे
जो मिट्टी के खिलौनों की तरह
तुरत टूटते भी नहीं थे
पर देखा जाए तो अज़ब से
इस निर्मम खेल को खेलते हुए
अब हमें ऊब ही जाना चाहिए ?
शायद ऊब आने का यह मुकम्मल वक्त है
______________________________
*सिर्फ
सिर्फ सीखना होगा हमें
“भूलना ”
मसलन
शिकायतो की फेहरिस्त बढ़ा
गँवाए गए
और गँवाए जा रहे
उन बेशुमार लम्हों को
यकीन है मुझे
बेशक एक बार ही सही
फिर पुकार सकेंगे
एक दूसरे का नाम
शिद्दत से हम
और इस दफ़ा
“भूलना” एक खामी नहीं
बेइंतेहा खूबसूरत कमाल होगा
यकीनन ...
“भूलना ”
मसलन
शिकायतो की फेहरिस्त बढ़ा
गँवाए गए
और गँवाए जा रहे
उन बेशुमार लम्हों को
यकीन है मुझे
बेशक एक बार ही सही
फिर पुकार सकेंगे
एक दूसरे का नाम
शिद्दत से हम
और इस दफ़ा
“भूलना” एक खामी नहीं
बेइंतेहा खूबसूरत कमाल होगा
यकीनन ...
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*सोलह आने यकीन
खिडकियों की झिर्रियो से झांकते
धूल से अटे
लटकते-झूलते
मकड़ी के जाले से
विकृत,घिनौने,बेमानी रिश्ते
हटाने की कोशिश में
हाथ आता है तो बस
मकड़ियो का रेंगता-लिजलिजा स्पर्श
शिराओं को सुन्न करता
देखते ही देखते
सम्पूर्ण कोमल अहसासों को
हौले से निगलता
नहीं मायने कि
लिंग क्या ??
हाँ, स्वभाव सम
आश्चर्यजनक
किन्तु शत प्रतिशत सत्य
और शेष
नोची-उधेड़ी
टीसती
लुहुलहान
खुरदुरी सतह
मकड़ियो का अस्तित्व
मुझ निरीह इंसान से
प्राचीन अवश्य रहा होगा
सोलह आने यकीन है मुझे
*सोलह आने यकीन
खिडकियों की झिर्रियो से झांकते
धूल से अटे
लटकते-झूलते
मकड़ी के जाले से
विकृत,घिनौने,बेमानी रिश्ते
हटाने की कोशिश में
हाथ आता है तो बस
मकड़ियो का रेंगता-लिजलिजा स्पर्श
शिराओं को सुन्न करता
देखते ही देखते
सम्पूर्ण कोमल अहसासों को
हौले से निगलता
नहीं मायने कि
लिंग क्या ??
हाँ, स्वभाव सम
आश्चर्यजनक
किन्तु शत प्रतिशत सत्य
और शेष
नोची-उधेड़ी
टीसती
लुहुलहान
खुरदुरी सतह
मकड़ियो का अस्तित्व
मुझ निरीह इंसान से
प्राचीन अवश्य रहा होगा
सोलह आने यकीन है मुझे
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*कुर्सियां या बुजुर्ग
अहाते के एक कोने में रखी
आसमां ताकती
कभी दीवारों से घंटों बतियाती
अपनी जिंदगी के दिन गुजारा करती हैं कुर्सियां !
अकेलेपन से घबरा
तिनका-तिनका कुतरे जाने की फ़िक्र किये बिना
चुलबुली गिलहरियों का
फटी आँखों से इंतज़ार किया करती हैं कुर्सियां !
जकड़े हाथ पांवों से बेबस
कतारबद्ध लाल चींटियों के द्वारा
स्वयं को हर क्षण खोखला होते देख भी
मुंह से उफ़ करने का हक भी कहाँ रखती हैं कुर्सियां !
चरमराते जोड़ों के कारन
शोर ना करने की सख्त हिदायते पा
अपने आंसुओं को ज़ज्ब कर
प्रहरो प्रहर झूलती ही रह जाती है कुर्सियां !
अपनी हर पीड़ा भूल
सबकी खुशी में खुश होते हुए
किसी के स्नेहिल हाथों का सहारा पा
तनिक ठुमक लेना चाहती हैं कुर्सियां !
तो कभी अपनों की तनिक सी परेशानी देख
कुछ न कर पाने की बेबसी से छटपटाते
जर्जर कांपते हाथ बढ़ाकर
ढेरों दुआएं देना चाहती हैं कुर्सियां !
जीते जी सबको खुश देखने की ख्वाइश लिए
किसी जरूरतमंद के चूल्हे की आग बन
सिर्फ़ राख होने का इंतज़ार किया करती हैं कुर्सियां ...
*कुर्सियां या बुजुर्ग
अहाते के एक कोने में रखी
आसमां ताकती
कभी दीवारों से घंटों बतियाती
अपनी जिंदगी के दिन गुजारा करती हैं कुर्सियां !
अकेलेपन से घबरा
तिनका-तिनका कुतरे जाने की फ़िक्र किये बिना
चुलबुली गिलहरियों का
फटी आँखों से इंतज़ार किया करती हैं कुर्सियां !
जकड़े हाथ पांवों से बेबस
कतारबद्ध लाल चींटियों के द्वारा
स्वयं को हर क्षण खोखला होते देख भी
मुंह से उफ़ करने का हक भी कहाँ रखती हैं कुर्सियां !
चरमराते जोड़ों के कारन
शोर ना करने की सख्त हिदायते पा
अपने आंसुओं को ज़ज्ब कर
प्रहरो प्रहर झूलती ही रह जाती है कुर्सियां !
अपनी हर पीड़ा भूल
सबकी खुशी में खुश होते हुए
किसी के स्नेहिल हाथों का सहारा पा
तनिक ठुमक लेना चाहती हैं कुर्सियां !
तो कभी अपनों की तनिक सी परेशानी देख
कुछ न कर पाने की बेबसी से छटपटाते
जर्जर कांपते हाथ बढ़ाकर
ढेरों दुआएं देना चाहती हैं कुर्सियां !
जीते जी सबको खुश देखने की ख्वाइश लिए
किसी जरूरतमंद के चूल्हे की आग बन
सिर्फ़ राख होने का इंतज़ार किया करती हैं कुर्सियां ...
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*पानी
*पानी
रे मन !
तनिक सोचो तों
अब किस पर लिखोगे
तुम कोई गीत भला ?
क्या लिखोगे
शुष्क हुई शस्य श्यामला पर
तनिक सोचो तों
अब किस पर लिखोगे
तुम कोई गीत भला ?
क्या लिखोगे
शुष्क हुई शस्य श्यामला पर
या
लिखोगे
बुझ चुके चूल्हों की कालिमा पर
सोंधी माटी की महक
कैसे सहेज पाओगे तुम ?
न कूक होगी कोयल की
बसंत फाग कजरी की न कोई गूंज होंगी
भूखी चीलों के रुदन पर
क्या कोई गीत रच पाओगे तुम ?
बहुत चीख चुके समवेत स्वर में
क्योंकि मुद्दे बहुत थे झंझट बहुत थे
शस्य श्यामला धरा को तुम शुष्क करके
शब्दों को किंचित छू भी पाओगे तुम ?
मुमकिन है कि ढूंड लोगे
स्वप्न में दरख्तों की छाँव बेशक
पर आँख खुलते ही
रेत के उड़ते गुबारों में
खुद को गुमशुदा देख पाओगे तुम ?
बुझ चुके चूल्हों की कालिमा पर
सोंधी माटी की महक
कैसे सहेज पाओगे तुम ?
न कूक होगी कोयल की
बसंत फाग कजरी की न कोई गूंज होंगी
भूखी चीलों के रुदन पर
क्या कोई गीत रच पाओगे तुम ?
बहुत चीख चुके समवेत स्वर में
क्योंकि मुद्दे बहुत थे झंझट बहुत थे
शस्य श्यामला धरा को तुम शुष्क करके
शब्दों को किंचित छू भी पाओगे तुम ?
मुमकिन है कि ढूंड लोगे
स्वप्न में दरख्तों की छाँव बेशक
पर आँख खुलते ही
रेत के उड़ते गुबारों में
खुद को गुमशुदा देख पाओगे तुम ?
*दूरियाँ
नही खत्म होती कुछ दूरियां ...
एक लंबे अरसे इत उत
भरपूर जोश में भागते हुए या
रफ़्ता रफ़्ता क़दम बढाने के वावजूद
जस की तस ही रहती हैं
दूर से आँख मिचौली खेलती दूरियां
और फिर किसी एक अलसुबह
खिडकी की झिर्री से दबे पाँव रास्ता बना
उनींदे चेहरे को चुकमुक ताकती
पलकों से खेलती एक नन्ही किरन
दे जाती है अचक ही इस सच का आभास ...
कि शुरू किया था सफर
जिस जगह से .. जिस तरह कभी
दरअसल आज भी मौजूद हैं हम
ठीक वैसे ही .. वहीँ के वहीँ ...
इस सच से बाबस्ता
नज़रें दूरियों पर नहीं
एक सवाल लिए
पांव तले जमीं पर टिक गयी है
भला वक्त तब ठहरा था या अब ?
________________________
ओढ़ी गयीं चुप्पियाँ !
ऊँगली में चमकते
उस खूबसूरत नगीने सी
जिसका दूसरा सिरा बेहद नुकीला
देता रहता हैं चुभन रात और दिन
वहीँ मासूमियत से
मन ही मन मुस्कराती रहती हैं चुप्पियाँ
एक लंबे अरसे इत उत
भरपूर जोश में भागते हुए या
रफ़्ता रफ़्ता क़दम बढाने के वावजूद
जस की तस ही रहती हैं
दूर से आँख मिचौली खेलती दूरियां
और फिर किसी एक अलसुबह
खिडकी की झिर्री से दबे पाँव रास्ता बना
उनींदे चेहरे को चुकमुक ताकती
पलकों से खेलती एक नन्ही किरन
दे जाती है अचक ही इस सच का आभास ...
कि शुरू किया था सफर
जिस जगह से .. जिस तरह कभी
दरअसल आज भी मौजूद हैं हम
ठीक वैसे ही .. वहीँ के वहीँ ...
इस सच से बाबस्ता
नज़रें दूरियों पर नहीं
एक सवाल लिए
पांव तले जमीं पर टिक गयी है
भला वक्त तब ठहरा था या अब ?
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ओढ़ी गयीं चुप्पियाँ !
ऊँगली में चमकते
उस खूबसूरत नगीने सी
जिसका दूसरा सिरा बेहद नुकीला
देता रहता हैं चुभन रात और दिन
वहीँ मासूमियत से
मन ही मन मुस्कराती रहती हैं चुप्पियाँ
ओढ़ी गयीं चुप्पियाँ
ऊँची अट्टालिकाओं और
ऊँची अट्टालिकाओं और
बंद कपाट वाले अभेद्य दुर्ग सी
सुरंग खोदने के प्रयास में
सुरंग खोदने के प्रयास में
हर पल घायल होता है मन
वहीँ गर्व से अकड
अकेले ही सारी उम्र गुजार लेती हैं चुप्पियाँ
वहीँ गर्व से अकड
अकेले ही सारी उम्र गुजार लेती हैं चुप्पियाँ
ओढ़ी गयीं चुप्पियाँ
न्याय पुस्तिका में न लिखे जा सके एक गंभीर अपराध सी
गवाह के अभाव में
दोषी करार दिए जाने वाले भय से मुक्त
न जाने क्यों
औरों को उम्र कैद की सज़ा दे जाती हैं चुप्पियाँ
न्याय पुस्तिका में न लिखे जा सके एक गंभीर अपराध सी
गवाह के अभाव में
दोषी करार दिए जाने वाले भय से मुक्त
न जाने क्यों
औरों को उम्र कैद की सज़ा दे जाती हैं चुप्पियाँ
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