* सुना, सुना तुमने ?
अब जब
लुढकते हैं दिन
रीती सुराही की तरह
जब बाँध देती हूँ
शाम की कतरने
पेड़ की टहनियों से
किसी टोटके की तरह
शाम की कतरने
पेड़ की टहनियों से
किसी टोटके की तरह
इंकार कर देता है तब
मेरा अपना ही साया
मुझे पहचानने से
मेरा अपना ही साया
मुझे पहचानने से
तब रात की स्लेट पर
उभर आती अपनी तस्वीर से
चीखते हुए कहती हूँ मैं ..
उभर आती अपनी तस्वीर से
चीखते हुए कहती हूँ मैं ..
‘दया के पात्र हैं सिर्फ़ वे
जिनके पास बेशुमार वजहें थीं
निर्मम होने के लिए ! ’
जिनके पास बेशुमार वजहें थीं
निर्मम होने के लिए ! ’
सुना, सुना तुमने ?
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*जब तक
जब तक नम हूँ मैं
मुझे गूंधते रहो
चाक पर घुमाते रहो
और अबा में तपाते रहो
जो किसी दुपहरी
अपनी सारी नमी
उडा दूंगी मैं
उड़कर
आँखों को
धुंधला दूंगी मैं
किरकिराती कोरें
मुमकिन है
तुम्हे दो घड़ी
सोचने को मजबूर कर दें
मुझे गूंधते रहो
चाक पर घुमाते रहो
और अबा में तपाते रहो
जो किसी दुपहरी
अपनी सारी नमी
उडा दूंगी मैं
उड़कर
आँखों को
धुंधला दूंगी मैं
किरकिराती कोरें
मुमकिन है
तुम्हे दो घड़ी
सोचने को मजबूर कर दें
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कभी
कुछ यूँ भी तो हो
कि सीख
जाऊं
एक दुकानदार की तरह
जरूरत और खुशियों की माप करते पलड़े को
अपनी मन मर्जी से झुकाना
एक दुकानदार की तरह
जरूरत और खुशियों की माप करते पलड़े को
अपनी मन मर्जी से झुकाना
कि सुन
सकूँ
ठोकरों से लगातार खडखडाती
खाली टीन सी चेतना में
पुरसुकूं देती जल तरंग की धुन
ठोकरों से लगातार खडखडाती
खाली टीन सी चेतना में
पुरसुकूं देती जल तरंग की धुन
या देख
सकूँ
भोंथरे चाक़ू से अहर्निश काटे जाते
दिल दिमाग के अनगिनत टुकड़ों को
एक खूबसूरत गुलदस्ते की तरह
भोंथरे चाक़ू से अहर्निश काटे जाते
दिल दिमाग के अनगिनत टुकड़ों को
एक खूबसूरत गुलदस्ते की तरह
कि बेध
सकूँ
चक्रवात से क्षत विक्षत
संवेदनशून्य हो चुकी इंसानियत की क्षुद्र आँख
कुंती पुत्र अर्जुन की तरह
चक्रवात से क्षत विक्षत
संवेदनशून्य हो चुकी इंसानियत की क्षुद्र आँख
कुंती पुत्र अर्जुन की तरह
गोकि वक्त का तकाज़ा है ...
हुनरमंद
होना ही चाहिए मुझे
हर विधा में .. हर हाल में मुझे
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हर विधा में .. हर हाल में मुझे
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निरर्थक सा लगता है ..........
अंतर्द्वंद से जूझते
आकुल अधीर मन को
बहलाने का प्रयास
निरर्थक सा लगता है
अंतर्द्वंद से जूझते
आकुल अधीर मन को
बहलाने का प्रयास
निरर्थक सा लगता है
स्वंयं को तलाशते हुए
स्वंयं को परखते हुए
स्वंयं को साबित करने का प्रयास
निरर्थक सा लगता है
स्वंयं को परखते हुए
स्वंयं को साबित करने का प्रयास
निरर्थक सा लगता है
हृदय में फैली अस्थिरता
हृदय के किसी कोने में छिपाकर
खुश दिखने का ढोंग
निरर्थक सा लगता है
हृदय के किसी कोने में छिपाकर
खुश दिखने का ढोंग
निरर्थक सा लगता है
क्या पाया, क्या खोया
कितना दे पाए, कितना मिला
जोड़-घटाव लगाना
निरर्थक सा लगता है
कितना दे पाए, कितना मिला
जोड़-घटाव लगाना
निरर्थक सा लगता है
हर ओर बिखरी धुंध
फैले बियाबां से
निकल आने का प्रयास
निरर्थक सा लगता है
फैले बियाबां से
निकल आने का प्रयास
निरर्थक सा लगता है
कुछ घबराई, कुछ ढूंडती आँखें
उनमे छिपे आँसुओं को
छिपाने का प्रयास
निरर्थक सा लगता है
उनमे छिपे आँसुओं को
छिपाने का प्रयास
निरर्थक सा लगता है
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*पत्थरों पर पड़े निशान
वक्त का झरना
झमाझम गिरता है तो गिरता रहे
पत्थरों पर पड़े निशान हटाने में
झरने को सदियों का इंतज़ार करना होगा
झरती इन बूंदों से
पियानो की दर्द भरी धुन नही निकलती
निकलती है तो सिर्फ़
मन के दरख्त पर पड़ती
धारदार कुल्हाड़ी से संघात करती
ठक ठक की ध्वनि !
और घबरा कर गिरने लगते हैं
एक एक कर
हथेलियों में सहेजे हुए सूरज
सितारे और छिपा कर रखे सारे ख्वाब !
इन पत्थरों पर दिखते गहरे निशान
मामूली चोटों से नही उभरे
ये नासूर है
सिर ढांपे पल्लू के नीचे फैल गए घावों के
झुकी आँखों
मुंह में जुबां न होने की सजाएं हैं ये निशान
जो मामूली नही
खुद को लगाई गयी चाबुकों से उभरे हैं
अफ़सोस करने से भी
कहीं माज़ी बदलते हैं क्या ?
वक्त का झरना
झमाझम गिरता है तो गिरता रहे
पत्थरों पर पड़े निशान हटाने में
झरने को सदियों का इंतज़ार करना होगा
झरती इन बूंदों से
पियानो की दर्द भरी धुन नही निकलती
निकलती है तो सिर्फ़
मन के दरख्त पर पड़ती
धारदार कुल्हाड़ी से संघात करती
ठक ठक की ध्वनि !
और घबरा कर गिरने लगते हैं
एक एक कर
हथेलियों में सहेजे हुए सूरज
सितारे और छिपा कर रखे सारे ख्वाब !
इन पत्थरों पर दिखते गहरे निशान
मामूली चोटों से नही उभरे
ये नासूर है
सिर ढांपे पल्लू के नीचे फैल गए घावों के
झुकी आँखों
मुंह में जुबां न होने की सजाएं हैं ये निशान
जो मामूली नही
खुद को लगाई गयी चाबुकों से उभरे हैं
अफ़सोस करने से भी
कहीं माज़ी बदलते हैं क्या ?
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* अबके
जो निकलेगा चाँद
तो क्या पूछ पाउंगी भला ..
क्यों चाहते थे तुम
हर लम्हे को ज़री गोटे से संवारना ..
देखो आज उंगलियों के साथ साथ
लफ्ज़ भी लहुलुहान हैं
काश कि समझा होता
कुम्हला उठता है छुई मुई का पौधा
सहेजने को बढ़ी हथेलियों से भी !
पैमाइशो से हो जाता है बहुत छोटा आसमां मेरा
हो जाती है शब् भी और स्याह कुछ ज्यादा तवील !
क्या हुआ जो नहीं है हर दरख्त सागौन सा
निखर उठती है जमीं
कमल और आक के सफ़ेद फूलो से भी !
कि नहीं चलना था मुझे पानी पर
सिर्फ चलना था जमीन पर मुझे
तो क्या पूछ पाउंगी भला ..
क्यों चाहते थे तुम
हर लम्हे को ज़री गोटे से संवारना ..
देखो आज उंगलियों के साथ साथ
लफ्ज़ भी लहुलुहान हैं
काश कि समझा होता
कुम्हला उठता है छुई मुई का पौधा
सहेजने को बढ़ी हथेलियों से भी !
पैमाइशो से हो जाता है बहुत छोटा आसमां मेरा
हो जाती है शब् भी और स्याह कुछ ज्यादा तवील !
क्या हुआ जो नहीं है हर दरख्त सागौन सा
निखर उठती है जमीं
कमल और आक के सफ़ेद फूलो से भी !
कि नहीं चलना था मुझे पानी पर
सिर्फ चलना था जमीन पर मुझे
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एक दुर्बोध..
अकेलेपन का !
अपनों को
नज़दीक
ना देख पाने का!
बस महसूसना
दूर से आती
आवाजों को यहाँ!
कुछ सरक जाने की
पीड़ा की कटु अनुभूतियाँ!
पिया है
मौन मेने सन्नाटों का !
यही तो झकझोर देता
मेरी चेतना को !
सासें चलती है मेरी
और हैरत से सुना करती हूँ
चिर स्पंदन इनका !
यही शाश्वत मौन
झुकने को उद्व्वेलित
मुझे है करता !
तो सहेज लूँ ना
इन पलों को जो बने कल
स्मृतियाँ !
क्यूकि चखा है
स्वाद मैंने भी
अकड़ के तीखे कटु
फलों का !
जिन्दगी को
देखते ही देखते
धुंआ बनते उड़ते देखा
झुकने का
अपना ही तो एक
निराला सौन्दर्य होता!
भुरभुरी मिटटी का
मार्बल, ग्रे नाईट से
है क्या कभी मुकाबला!
पर अफ़सोस
झुकने का अर्थ
याचना कमजोरी ही लिया जाता!
मुझे फलों से झुके
पंछियों के कलरव से चहचहाते
तरु ही रिझाते सदा!
सीधे अकड़े
नितांत अकेले वृक्ष की कल्पना
पल भर को भी मुझे
मंजूर नहीं यहाँ !
क्यू ना प्रेम सिक्त कर
गीत गाये मिलन के
यही तो धरा पर झुका
कह रहा गगन भी
और झुके बिना
पुष्प तोडना
संभव है क्या ?
अकेलेपन का !
अपनों को
नज़दीक
ना देख पाने का!
बस महसूसना
दूर से आती
आवाजों को यहाँ!
कुछ सरक जाने की
पीड़ा की कटु अनुभूतियाँ!
पिया है
मौन मेने सन्नाटों का !
यही तो झकझोर देता
मेरी चेतना को !
सासें चलती है मेरी
और हैरत से सुना करती हूँ
चिर स्पंदन इनका !
यही शाश्वत मौन
झुकने को उद्व्वेलित
मुझे है करता !
तो सहेज लूँ ना
इन पलों को जो बने कल
स्मृतियाँ !
क्यूकि चखा है
स्वाद मैंने भी
अकड़ के तीखे कटु
फलों का !
जिन्दगी को
देखते ही देखते
धुंआ बनते उड़ते देखा
झुकने का
अपना ही तो एक
निराला सौन्दर्य होता!
भुरभुरी मिटटी का
मार्बल, ग्रे नाईट से
है क्या कभी मुकाबला!
पर अफ़सोस
झुकने का अर्थ
याचना कमजोरी ही लिया जाता!
मुझे फलों से झुके
पंछियों के कलरव से चहचहाते
तरु ही रिझाते सदा!
सीधे अकड़े
नितांत अकेले वृक्ष की कल्पना
पल भर को भी मुझे
मंजूर नहीं यहाँ !
क्यू ना प्रेम सिक्त कर
गीत गाये मिलन के
यही तो धरा पर झुका
कह रहा गगन भी
और झुके बिना
पुष्प तोडना
संभव है क्या ?
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