*मरजानी लड़कियां
न जाने कहाँ से
ले आती हैं अपने हिस्से की
हवा और धूप
और पलक झपकते ही
घर-आंगन में महक उठती हैं हरे धनिया सी
ये मरजानी लड़कियां
ले आती हैं अपने हिस्से की
हवा और धूप
और पलक झपकते ही
घर-आंगन में महक उठती हैं हरे धनिया सी
ये मरजानी लड़कियां
गोल-मटोल नन्ही कलाइयों में
झमक कर पहन लेती हैं चूडियाँ माँ की
और खनक उठती हैं चूडियों सी
ये मरजानी लड़कियां
झमक कर पहन लेती हैं चूडियाँ माँ की
और खनक उठती हैं चूडियों सी
ये मरजानी लड़कियां
न संवारों न दुलारो तो भी
न जाने कब और कैसे
ओक में भर लेती हैं अपने हिस्से की चांदनी
ये मरजानी लड़कियां
न जाने कब और कैसे
ओक में भर लेती हैं अपने हिस्से की चांदनी
ये मरजानी लड़कियां
नींद में भी चल देती हैं
संवारने बिखरा हुआ घर
कजरी सी गूंज उठती हैं बियाबानों में
ये मरजानी लड़कियां
संवारने बिखरा हुआ घर
कजरी सी गूंज उठती हैं बियाबानों में
ये मरजानी लड़कियां
चटके दर्पण में निहारती हैं
अपनी आँखों की चमक
और खुद पर ही हो उठती हैं निसार
ये मरजानी लडकियां
अपनी आँखों की चमक
और खुद पर ही हो उठती हैं निसार
ये मरजानी लडकियां
कहने को तो
कपास सी उड़ी फिरती हैं हवाओं संग
पर रो उठती हैं अक्सर मुस्कुराते हुए
ये मरजानी लड़कियां
कपास सी उड़ी फिरती हैं हवाओं संग
पर रो उठती हैं अक्सर मुस्कुराते हुए
ये मरजानी लड़कियां
__________________________
*गुरु मानूँ तो मानूँ
किसे ?
गुरु मानूँ तो मानूँ
किसे
उसे?
गर्भ में खत्म करने के
लिए मुझे
उड़ेल कर हलक में सिरका
दुनिया का चलन समझाया जिसने?
दुनिया का चलन समझाया जिसने?
या उसे
आधा पानी आधा दूध थमाकर
हर हाल में
जिन्दा रहने का हुनर
सिखाया जिसने?
या फिर उसे
राह चलते फब्तियां
कस-कस
अपनी अलबेली सोच से
परिचित कराया जिसने?
या उसे
अपनी नापाक़ हरक़तों से
गुरु हो सकने का हर भरम
तोड़ा जिसने?
या फिर उसे
अँधेरे रास्तों में
अकेला छोड़
मेरा खुद से तआरुफ़
कराया जिसने?
_____________________
*जब तक
जब तक नम हूँ मैं
मुझे गूंधते रहो
चाक पर घुमाते रहो
और अबा में तपाते रहो
जो किसी दुपहरी
अपनी सारी नमी
उडा दूंगी मैं
उड़कर
आँखों को
धुंधला दूंगी मैं
किरकिराती कोरें
मुमकिन है
तुम्हे दो घड़ी
सोचने को मजबूर कर दें
मुझे गूंधते रहो
चाक पर घुमाते रहो
और अबा में तपाते रहो
जो किसी दुपहरी
अपनी सारी नमी
उडा दूंगी मैं
उड़कर
आँखों को
धुंधला दूंगी मैं
किरकिराती कोरें
मुमकिन है
तुम्हे दो घड़ी
सोचने को मजबूर कर दें
_______________
प्रिये !
प्रिये !
ढूंढो
खुद को
जैसे झुंड में
ढूंड लेती है गाय
बछड़े को
पुकारो
खुद को
जैसे पुकारती है
पत्तियां
मेघों को
जगाओ
खुद को
जैसे नरम पंजों से
जगाते हैं पंछी
पेड़ों को
चाहती हूँ मैं
तुम हांके जाओ
सिर्फ़
अपनी ही छड़ी से !
______________
*आखिर क्यों ?
खिड़की से चाँद को झांकते देख
सुरमई पैरहन वाली लड़की
सहम जाती हैं अब !
कांपती नम सी हथेलियों से
अपने चेहरे की गुलाबी परत को
एक अँधेरी दुछत्ती में
धूल अटे अखबार की ढेरी तले
दबा देना चाहती है वो
छुटपन में
इसी चाँद की रौशनी के वक्फों को
गुल्लक में सहेजती
तितलियों के बूटे सजी फ़्रोक पहने
अँधेरी रातो को जुबां दिखा.. खिझाती
समंदर में हिलोरे लेते "उसी "
संदली दुधिया अक्स से सहमी
मौजूद हर साजो सामां से "अब"
पलकें मूँद लेना चाहती है वो ..
पिघलती निगाहों से घूरता
होठो को गोल घुमाता
उफ्फ्फ ..ये गुलदान भी औरो की तरह ..
आज हथेलियों की लकीरों में
अपना वजूद तलाशती
मानो मीलो का सफ़र तय कर हांफती
मन ही मन खौफजदा सोचती
क्या अहसास और निगाहें भी
चेहरे की रंगत और
पन्ने पर लफ्जों के रूप, आकार देख
अपनी रबायतें भूल
रास्ता भटक जाया करते हैं ?
पर क्यों ... आखिर क्यों ?
________________________
*पत्थरों पर पड़े निशान
वक्त का झरना
झमाझम गिरता है तो गिरता रहे
पत्थरों पर पड़े निशान हटाने में
झरने को सदियों का इंतज़ार करना होगा
झरती इन बूंदों से
पियानो की दर्द भरी धुन नही निकलती
निकलती है तो सिर्फ़
मन के दरख्त पर पड़ती
धारदार कुल्हाड़ी से संघात करती
ठक ठक की ध्वनि !
और घबरा कर गिरने लगते हैं
एक एक कर
हथेलियों में सहेजे हुए सूरज
सितारे और छिपा कर रखे सारे ख्वाब !
इन पत्थरों पर दिखते गहरे निशान
मामूली चोटों से नही उभरे
ये नासूर है
सिर ढांपे पल्लू के नीचे फैल गए घावों के
झुकी आँखों
मुंह में जुबां न होने की सजाएं हैं ये निशान
जो मामूली नही
खुद को लगाई गयी चाबुकों से उभरे हैं
अफ़सोस करने से भी
कहीं माज़ी बदलते हैं क्या ?
___________________________
*आखिर क्यों ?
खिड़की से चाँद को झांकते देख
सुरमई पैरहन वाली लड़की
सहम जाती हैं अब !
कांपती नम सी हथेलियों से
अपने चेहरे की गुलाबी परत को
एक अँधेरी दुछत्ती में
धूल अटे अखबार की ढेरी तले
दबा देना चाहती है वो
छुटपन में
इसी चाँद की रौशनी के वक्फों को
गुल्लक में सहेजती
तितलियों के बूटे सजी फ़्रोक पहने
अँधेरी रातो को जुबां दिखा.. खिझाती
समंदर में हिलोरे लेते "उसी "
संदली दुधिया अक्स से सहमी
मौजूद हर साजो सामां से "अब"
पलकें मूँद लेना चाहती है वो ..
पिघलती निगाहों से घूरता
होठो को गोल घुमाता
उफ्फ्फ ..ये गुलदान भी औरो की तरह ..
आज हथेलियों की लकीरों में
अपना वजूद तलाशती
मानो मीलो का सफ़र तय कर हांफती
मन ही मन खौफजदा सोचती
क्या अहसास और निगाहें भी
चेहरे की रंगत और
पन्ने पर लफ्जों के रूप, आकार देख
अपनी रबायतें भूल
रास्ता भटक जाया करते हैं ?
पर क्यों ... आखिर क्यों ?
________________________
*पत्थरों पर पड़े निशान
वक्त का झरना
झमाझम गिरता है तो गिरता रहे
पत्थरों पर पड़े निशान हटाने में
झरने को सदियों का इंतज़ार करना होगा
झरती इन बूंदों से
पियानो की दर्द भरी धुन नही निकलती
निकलती है तो सिर्फ़
मन के दरख्त पर पड़ती
धारदार कुल्हाड़ी से संघात करती
ठक ठक की ध्वनि !
और घबरा कर गिरने लगते हैं
एक एक कर
हथेलियों में सहेजे हुए सूरज
सितारे और छिपा कर रखे सारे ख्वाब !
इन पत्थरों पर दिखते गहरे निशान
मामूली चोटों से नही उभरे
ये नासूर है
सिर ढांपे पल्लू के नीचे फैल गए घावों के
झुकी आँखों
मुंह में जुबां न होने की सजाएं हैं ये निशान
जो मामूली नही
खुद को लगाई गयी चाबुकों से उभरे हैं
अफ़सोस करने से भी
कहीं माज़ी बदलते हैं क्या ?
___________________________
* ‘बचा लो , मुझे बचा लो ’
ज्यों नुकीले पंजों में छटपटाता
कातर दारुण स्वर में गुहार लगाता
आज फिर कोई निरीह
और उभर आती हैं दिलो दिमाग पर
अनगिनत गहरी दर्दनाक खरोंचे
सूजे माथे ..मरोड़ी स्याह पड़ी कलाइयां
चूडियों के टूटे रंगीन टुकड़े
चारो ओर लुढकते बर्तनों की
कर्ण भेदी चीखें सुनीं हैं मैंने
कि कहीं कुछ भी नही बदला
अपने पाँव पर खड़े होने में नाकाम
फिर भी तांडव करता भरतार
बिलखते दुधमुंहें को सूखी छाती से चिपकाए
मायके की बंद चौखट याद करती
तो कभी सहानुभूति की ओट ले
घूरते डरावने सायों से बचती बचाती
आँख खुलते ही सुबह
खौलते पानी में
चाय की पत्ती डालने से पहले
मांग में गहरा सिन्दूर भरना नही भूलती
क्लास में बदलाव, बराबरी का दर्जा,
आसमान, पंछी, रंग जैसे शब्दों के
मायने समझाते हुए ठठा कर हंस पड़ती
लोहे के नुकीले तारों में फंसी
ऐसे ही तार तार होती रहती है लाल चूनर ....
ज्यों नुकीले पंजों में छटपटाता
कातर दारुण स्वर में गुहार लगाता
आज फिर कोई निरीह
और उभर आती हैं दिलो दिमाग पर
अनगिनत गहरी दर्दनाक खरोंचे
सूजे माथे ..मरोड़ी स्याह पड़ी कलाइयां
चूडियों के टूटे रंगीन टुकड़े
चारो ओर लुढकते बर्तनों की
कर्ण भेदी चीखें सुनीं हैं मैंने
कि कहीं कुछ भी नही बदला
अपने पाँव पर खड़े होने में नाकाम
फिर भी तांडव करता भरतार
बिलखते दुधमुंहें को सूखी छाती से चिपकाए
मायके की बंद चौखट याद करती
तो कभी सहानुभूति की ओट ले
घूरते डरावने सायों से बचती बचाती
आँख खुलते ही सुबह
खौलते पानी में
चाय की पत्ती डालने से पहले
मांग में गहरा सिन्दूर भरना नही भूलती
क्लास में बदलाव, बराबरी का दर्जा,
आसमान, पंछी, रंग जैसे शब्दों के
मायने समझाते हुए ठठा कर हंस पड़ती
लोहे के नुकीले तारों में फंसी
ऐसे ही तार तार होती रहती है लाल चूनर ....
____________________
*मैं ऐसा ही हूँ
चढ़ता
सूरज
एक
निरंकुश शासक सा
“मै ऐसा ही हूँ “
दंभ से
लाल पीला हो तमतमाता
गढता है
हर रोज रण नीतियाँ
अपनी
जिंदगी अपने शर्तों पर जीने की
फिर
फैलाता है निर्द्वंद रार
अपने
मद में चूर
भून
देता है अपनों के अरमान
और सांझ ढले
अपनी
जिद का नशा उतरते ही
शर्मिंदा
हो
अपनों
से नज़रे चुराता
खुद को
डुबो देता
समंदर
के खारे द्रव्य में
पथराई धरा
अपने नन्हे छौनों को
मुरझाया देख
सब बिसरा
अपनी खंगाली हुई
समूची शीतलता उडेलती
उन्हें अंक में सहेजती
शून्य में ताकती रह जाती है ...
_________________________
*क्यों ... आखिर क्यों ?? "
खिड़की से चाँद को झांकते देख
सुरमई पैरहन वाली लड़की
सहम जाती हैं अब !
कांपती नम सी हथेलियों से
अपने चेहरे की गुलाबी परत को
एक अँधेरी दुछत्ती में
धूल अटे अखबार की ढेरी तले
दबा देना चाहती है वो
छुटपन में
इसी चाँद की रौशनी के वक्फों को
गुल्लक में सहेजती
तितलियों के बूटे सजी फ़्रोक पहने
अँधेरी रातो को जुबां दिखा.. खिझाती
समंदर में हिलोरे लेते "उसी "
पथराई धरा
अपने नन्हे छौनों को
मुरझाया देख
सब बिसरा
अपनी खंगाली हुई
समूची शीतलता उडेलती
उन्हें अंक में सहेजती
शून्य में ताकती रह जाती है ...
_________________________
*क्यों ... आखिर क्यों ?? "
खिड़की से चाँद को झांकते देख
सुरमई पैरहन वाली लड़की
सहम जाती हैं अब !
कांपती नम सी हथेलियों से
अपने चेहरे की गुलाबी परत को
एक अँधेरी दुछत्ती में
धूल अटे अखबार की ढेरी तले
दबा देना चाहती है वो
छुटपन में
इसी चाँद की रौशनी के वक्फों को
गुल्लक में सहेजती
तितलियों के बूटे सजी फ़्रोक पहने
अँधेरी रातो को जुबां दिखा.. खिझाती
समंदर में हिलोरे लेते "उसी "
संदली दुधिया अक्स से सहमी
मौजूद हर साजो सामां से "अब"
पलकें मूँद लेना चाहती है वो ..
पिघलती निगाहों से घूरता
होठो को गोल घुमाता
उफ्फ्फ ..ये गुलदान भी औरो की तरह ..
आज हथेलियों की लकीरों में
अपना वजूद तलाशती
मानो मीलो का सफ़र तय कर हांफती
मन ही मन खौफजदा सोचती
क्या अहसास और निगाहें भी
चेहरे की रंगत और
पन्ने पर लफ्जों के रूप, आकार देख
अपनी रबायतें भूल
रास्ता भटक जाया करते हैं ?
पर क्यों ... आखिर क्यों ?
मौजूद हर साजो सामां से "अब"
पलकें मूँद लेना चाहती है वो ..
पिघलती निगाहों से घूरता
होठो को गोल घुमाता
उफ्फ्फ ..ये गुलदान भी औरो की तरह ..
आज हथेलियों की लकीरों में
अपना वजूद तलाशती
मानो मीलो का सफ़र तय कर हांफती
मन ही मन खौफजदा सोचती
क्या अहसास और निगाहें भी
चेहरे की रंगत और
पन्ने पर लफ्जों के रूप, आकार देख
अपनी रबायतें भूल
रास्ता भटक जाया करते हैं ?
पर क्यों ... आखिर क्यों ?
__________________
*स्वतंत्र हो तुम
हम पर फिकरे कसने के लिए
निगाहों से ही साबुत हजम कर जाने के लिए
दूर से भोंडे संदेशे भेजे जाने के लिए
बालो में झांकती सफेदी भूल
यह कहने के लिए कि
“दिल तो बच्चा है जी ”
और मन मर्जी ना चलने पर
यहाँ तक कि तेज़ाब से हमारी चमड़ी झुलसाने के लिए
अच्छा है मुगालता रखना
खूबसूरत दुनिया के शहंशाह होने का
पर महज़ ख्वाबो में ही नहीं ?
यदि नहीं
तो आक्रोश नहीं
नफरत नहीं
तुमपर तरस के साथ
अबसे यही दुआ करुँगी
कि और और तीव्र हो
तुम्हारी स्मरन ,दृश्य और श्रवण शक्ति
कि गूंजती रहे हर पल तुम्हारे कानो में
सिर्फ टंकार उन हृदय विदारक चीखो की
बस जाए एकही तस्वीर तुम्हारी आँखों में
उन चीथड़े रह गयी जिन्दा लाशो की
हो सके तो देखना दर्पण
आज फिर से एक बार
क्या ये वही कुलदीपक
अपनी जन्मदात्री का गौरव
घोंट साँसे गर्भ में ही हमारी
किये गए व्रत और मनौतियां जिसके लिए
अचरज है कि
नहीं भक्षण करते चील और कव्वे भी
कभी जीवित प्राणियों का
फिर तुम ..... ???
और हमेशा की तरह
आज भी पूर्ण स्वतंत्र हो तुम
शेष रह गए इन रिक्त स्थानों को
अपनी मर्जी से भरने के लिए
हम पर फिकरे कसने के लिए
निगाहों से ही साबुत हजम कर जाने के लिए
दूर से भोंडे संदेशे भेजे जाने के लिए
बालो में झांकती सफेदी भूल
यह कहने के लिए कि
“दिल तो बच्चा है जी ”
और मन मर्जी ना चलने पर
यहाँ तक कि तेज़ाब से हमारी चमड़ी झुलसाने के लिए
अच्छा है मुगालता रखना
खूबसूरत दुनिया के शहंशाह होने का
पर महज़ ख्वाबो में ही नहीं ?
यदि नहीं
तो आक्रोश नहीं
नफरत नहीं
तुमपर तरस के साथ
अबसे यही दुआ करुँगी
कि और और तीव्र हो
तुम्हारी स्मरन ,दृश्य और श्रवण शक्ति
कि गूंजती रहे हर पल तुम्हारे कानो में
सिर्फ टंकार उन हृदय विदारक चीखो की
बस जाए एकही तस्वीर तुम्हारी आँखों में
उन चीथड़े रह गयी जिन्दा लाशो की
हो सके तो देखना दर्पण
आज फिर से एक बार
क्या ये वही कुलदीपक
अपनी जन्मदात्री का गौरव
घोंट साँसे गर्भ में ही हमारी
किये गए व्रत और मनौतियां जिसके लिए
अचरज है कि
नहीं भक्षण करते चील और कव्वे भी
कभी जीवित प्राणियों का
फिर तुम ..... ???
और हमेशा की तरह
आज भी पूर्ण स्वतंत्र हो तुम
शेष रह गए इन रिक्त स्थानों को
अपनी मर्जी से भरने के लिए
__________________________________
*गुजर जाएगा एक और दिन
छोड़ जाएगा
क्षत विक्षत अपने अनगिनत अवशेष
अपने होने की असह्य पीड़ा ढोता
कटोरे भर पानी में
छटपटाता सोन मछरी सा
गुजर ही जायेगा एक और दिन
सिर्फ़ सभ्य हुआ हैं इंसान
सुसंस्कृत नही
किसी जादुई दुनिया की तलाश में भटकते
अपने दिमाग के हर फितूर का इलाज़
बहुत होशियारी और सहूलियत से ढूंडते
किसी उजले दिनों की आस करते
गुजर ही जायेगा एक और दिन
अपनों में अजनबियों सा
तो परदेसियों में अपनापन तलाशते
अकेलेपन से विक्षिप्त
अपनी त्वचा के नीचे
अनगिनत छिपकलियों की सरसराहट महसूसते
बेतरतीब गिरहें खोलते सुलझाते
किसी तरह गुजर ही जायेगा एक और दिन
*गुजर जाएगा एक और दिन
छोड़ जाएगा
क्षत विक्षत अपने अनगिनत अवशेष
अपने होने की असह्य पीड़ा ढोता
कटोरे भर पानी में
छटपटाता सोन मछरी सा
गुजर ही जायेगा एक और दिन
सिर्फ़ सभ्य हुआ हैं इंसान
सुसंस्कृत नही
किसी जादुई दुनिया की तलाश में भटकते
अपने दिमाग के हर फितूर का इलाज़
बहुत होशियारी और सहूलियत से ढूंडते
किसी उजले दिनों की आस करते
गुजर ही जायेगा एक और दिन
अपनों में अजनबियों सा
तो परदेसियों में अपनापन तलाशते
अकेलेपन से विक्षिप्त
अपनी त्वचा के नीचे
अनगिनत छिपकलियों की सरसराहट महसूसते
बेतरतीब गिरहें खोलते सुलझाते
किसी तरह गुजर ही जायेगा एक और दिन
__________________________________
*बेरुखी
हर रोज़
खुशी से लचकती
खिलखिलाती पत्तियों को
आज़ ढलके काँधे और
अनझिप आँखों से इकटक ताकते
किसी सोच में गुमसुम पाया
हो न हो
जरूर अनदेखा कर
अनमनी सी गुजरी होगी
हवा
नज़दीक से अभी
बेरुखी !
हथेली में रखे उस पासे की तरह
जिसके हर ओर लिखी होती है
काले बिंदुओं से
सिर्फ़ उदासी !!!
आज़ ढलके काँधे और
अनझिप आँखों से इकटक ताकते
किसी सोच में गुमसुम पाया
हो न हो
जरूर अनदेखा कर
अनमनी सी गुजरी होगी
हवा
नज़दीक से अभी
बेरुखी !
हथेली में रखे उस पासे की तरह
जिसके हर ओर लिखी होती है
काले बिंदुओं से
सिर्फ़ उदासी !!!
____________________________
*असल वक्फियतों में जिंदगी तलाशती रात
सिरहाने मुंह दिए रात की पलके
अभी भी उनींदी सी ..
खारे पानी के ठहरने से
चिपचिपी ...कुछ सख्त सी कोरें
आज अंधियारे पाख की
विष बेल सी डरावनी चौदस है ना
हर ओर सन्नाटे
कुछ गुपचुप सी परछाइयां
ना थपकी देती लोरियां
न कोई लुभावना मंजर
न गुदगुदाती यादें
विष बेल सी डरावनी चौदस है ना
हर ओर सन्नाटे
कुछ गुपचुप सी परछाइयां
ना थपकी देती लोरियां
न कोई लुभावना मंजर
न गुदगुदाती यादें
बस दरख्तों के घने
जर्द स्याह साये तले
कुछ उंघते ...बासी ..रूखे ..चटखते
रह रह कर कर्कश आवाज़ निकालते लम्हे
और कभी कभी
उधार की टिमटिमाती
रंग बिरंगी रौशनियाँ
हवा से बतियाती
पत्तियों की फुसफुसाहटे भी
सुन्न कानो तक
बमुश्किल ही पहुँच पाती हैं
कुछ गर्म बूंदे
आज ओस बन
सख्त मुंडेरो से टपक पड़ी हैं ...!
कल अमावस के बाद चाँद भी दिखेगा ...
क्या पता वह भी बादलो की ओट ले
मुझे अँधेरे की ओढनी फिर ओढा दे
अपनी राहें ..अपनी खुशियाँ
अपने ख्वाबो की तामीर भी ख़ुद ही करना!
पर कब तक ..?
पर इससे पहले कि
फैले भोर का चुभता उजाला
बोने ही होंगे मुझे कुछ ख्वाब
खुद अपने लिए!
_____________________________
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