शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

*भला कह सकोगे क्या ?
कह सकोगे क्या ?
हम मेहनतकशों की
बाजुओं की ताकत
और ज़ज्बा देख
उद्व्गिन रहते हो तुम
फक्क पड़ जाता है
तुम्हारे चेहरे का रंग
जब पीठ पर दुधमुंहा बांधे
ईंटों के चट्टे उठाये हुए
गूंज उठते हैं गीत
हमारे सूखे पपडाए होठों से
हमारी जिजीविषा के साक्षी
हवा में झूलते इतराते
हमारे चुटीले के फुंदने ,
रंग बिरंगी चूडियाँ कसे
भट्टी में ईंधन झोंकती हमारी कलाइयां
भर देती हैं तुम्हे घोर अचम्भे से
यहाँ तक कि
इस परम सत्य से भी किंचित
अपरिचित नही तुम
कि हमारे क़दमों की आहट बिना
तुम्हारे घरों की
सुबह नही होंती
मूर्तिवत रह जाते हो तुम
जब हमारे बच्चे
पाठशाला की चौखट छुए बगैर
झट बता जाते हैं
हवाओं और मौसमों के मिजाज़
और दुनियादारी के तमाम जोड़ घटाव
हमें पथरीली जमीन पर
खर्राटे लेते देख
आलीशान भवनों में
हिम शिला खण्डों से तैरते
तो कभी साहिल पर
फैन उगलती लहरों से तुम
सफ़ेद लाल पीली गोलियाँ निगलते
गुदगुदे गद्दों पर भी रतजगे करते
अपने शुष्क हुए कंठ को
बार बार तर करते 
हमारी बेफिक्री से घबराते हो तुम ?
भला कह सकोगे क्या ?
    (अहा जिन्दगी में प्रकाशित)




______________________________



ये नन्हे कलंदर हैं
जब ठुमक कर चलते हैं
तो अपनी पैजनियों से,
करधनियों से नूपुर की ध्वनि नही
करतबों के हैरत अंगेज नाद उत्पन्न करते हैं

तालियों के शोर में
रस्सी पर
एक पांव से देर तक हवा में झूलते
ये वो बोधि वृक्ष हैं
जिनकी छाँव में यदि चाहो तो
समझे जा सकते हैं
ध्यान औ योग के अस्फुट पाठ

कनस्तरों, टूटे बक्सों
प्लास्टिक कंटेनरों पर
ओर्केस्ट्रा की धुनें निकालते
ये कलन्दर
महंगे साजों और तालीम के भी
मोहताज़ कहाँ होते हैं ?

ककहरा पढ़ने की उम्र में
एक नही कितने ही एकलव्य
अजाने गली- कूचों में
अपनी धनुष सी काया से
कलाबाजियों के तीर साधते
जरूरतों में लिपटे कलाओं के ये जखीरे
आखिर सहेजे क्यों नही जाते  ?

चाक पर खुद ब खुद घूमती
जीती जागती ये जिंदगियां  
बेवक्त उठे आँधियों में
बिखर जाने भर के लिए तो नही
अनगढ़ हाथों में पड़
बदशक्ल हो जाने भर के लिए तो नही?



___________________________



वो देखो 
बह रहीं संवेदनाएं सतह पर
कागज़ की कश्तियों सी 
उथली- उथली
धुंध ही धुंध छायी है 
हर ओर बेचैनियों की 
कहीं बंद दरीचों में 
मज़मे लगे हैं ख्वाइशों के 
खुमार तारी है कहीं शोहरतों का
पर जरा देखो उधर
तालियों के शोर में 
धुंधले इन गलियारों में 
बचपन है कि 
गुम हुआ जाता हैं कहीं
और उस पर 
पीठ से ज्यादा 
बोझा लिए ज़ेहन पर 
भला थकेंगे पाँव इनके या 
तवील ऐसी सर्द रातों में 
पहले सुन्न होगा ज़ेहन इनका ?
रौशनियाँ 
झूलती हैं ज़मीं से 
कहीं उपर 
ऊँची मेहराबों पर 
बेपरवाह 
अपने आंगन के अंधेरों से
फिर भी 
तमन्नाएँ हैं कि 
सिर्फ़ खुद से बाबस्ता 
कागज की कश्तियों सी 
इठलाती बढ़ी जाती हैं ........



_________________________



*मुमकिन है कि ...

हर शाम 
झर गये हरेक पत्ते से
पूछती हूँ
झर जाने की वज़ह
रख देती हूँ 
हथेलियों पर उनकी
बचा कर रखे सुनहले सिक्के 
गुनगुना देती हूँ 
इक गीत उनके कानों में 
और ले लेती हूँ वादा 
सब्ज़ रहने का
हाथ बढ़ा 
चुरा लेती हूँ 
हवाओं से नमी 
और सरका देती हूँ 
जमीन में दबी 
गुल्लक में
बादलों को परे कर 
लपक लेती हूँ रौशनी सूरज से 
आँधियों में 
जड़ों को बांधे रखती हूँ 
अपनी माटी से
पत्ते होंगे 
तो मुमकिन है कि 
लौट आयें 
दूर देश उड़ गये पंछी




________________________________




*दोराहे पर

दोराहे पर 
ठिठकी हैं 
कुछ परछाइयां
उनकी पढने की उम्र है 
पर कंधे पर बस्ते नही 
खेलने की उम्र है 
पर हाथों में खिलौने भी नही
उनके चेहरे 
सांध्य बेला में 
कीट-पतंगों से घिरे 
पुष्प सरीखे नज़र आते हैं
उनकी आँखों में 
तितलियों के 
पर छूने की ललक नही 
सब कुछ गिरा देने को आकुल 
बेशुमार आंधियां हैं
वे देख रहे हैं 
धरती को धुआं-धुंआ होते हुए
वे देख रहे हैं 
भीड़ को बसों और 
गाड़ियों के शीशे तोड़ते हुए
हाथ बढ़ा 
वे रोकना चाहते हैं 
पूछना चाहते हैं कुछ सवाल 
हर आते-जाते से
पर भींगे परिंदे से 
फडफडा कर रह जाते हैं 
उनके होंठ
नही रुकता कोई
कोई रुकता भी नही



_____________________


घना कोहरा ही होता है 
मुफीद वक्त 
इन मासूमों को
अपने पेट की भूख का इन्तजाम करने के लिए

जब ठण्ड से सिकुड़े होते हैं मवेशी भी 
और छिपे होते है हम गर्म रजाइयो में ,
आँख खोलते ही आ जाते हैं बोरे
इन नौनिहालों के कंधो पर... 

क्या सचमुच नहीं आता
इनके जीवन में एक भी ऐसा दिन 
यह कह माँ की गोद में दुबक जाने का
कि थोड़ा और सोने दो न माँ , आज बहुत सर्दी है

कश्मकश में हूँ कि
क्या इनकी उंगलियां
हाड मांस की ही है ? 
ठीक हमारी उंगलियों की तरह
जो नहीं सुन्न होती
कडकडाती ठण्ड में भी ?

सूती इकलौती कमीज़
और चप्पलो में भी 
नहीं कटकटाते देखे कभी इनके दांत
यकीन करना ही होगा हमें  
नहीं ये किसी अन्य ग्रह के जीव

हर सुबह ताकते हैं
पल भर के लिए धुंध भरा आसमान 
और कर जाते हैं मासूमियत से प्रार्थना - 
‘काश, और देर से उगे आज का भी सूरज... !’ 
{
क्या वास्तव में इन नौनिहालों का सूरज कभी उदय नहीं होना ? }






__________________________



जेठ बैशाख में
रात खत्म होने से
कुछ पहले ही 
आ धमकते हैं उजियारे
अँधेरे दूर करने की जिद में 
रौबदार सुर्ख आँखें लिए बिछा देते हैं इस 
छोर से उस छोर तक धूप ही धूप
देखने लगती हूँ मैं 
हवा संग खिलखिलाती झूमती 
अभी अभी जन्मी उस नन्ही दूब को ,जो 
सांझ तक झुलसा हुआ पाएगी अपनी 
मासूमियत को , अपने बचपने को
मैं लेती हूँ सांस जिसमें 
घुले हुए हैं कई रंग , घुटन के 
उमस के , उस पीड़ा के क्योंकि
मैं जानती हूँ कि मैं हूँ 
अपराधी उस दूब की जिसने 
बचपने को झुलसते हुए मूक देखते रहने की



___________________________



सावन की भोर ..... और आँख खुलते ही कानों में सुनायी देती हैं कुछ मासूम आवाजें ... " बेल पत्र ले लो बेल पत्र .... " और धर्म कर्म के अर्थ गठन करता मन सिर्फ यह बुदबुदा उठता है ........... कि यह धूसर दिनों की एक आखिरी सांझ भर हो .....
 


*
कब तक 

वे कैनवस हैं 
अपनी निर्दोष आभा फैलाते
उजली दूधिया चांदनी से पाकीज़ कैनवस !

और उन कैनवस पर 
दुर्लभ एक ही रंग 
ईमानदारी के रंग से उकेरी 
दुनिया की इकलौती 
सुनी जा सकने वाली तस्वीरें !

गर ज़रा भी कोशिश की जाए 
तो सुनाई देती है इन तस्वीरों से
कानों में मद्धम घुलती 
सुरीली एक धुन 

वही धुन जो भोर होते ही 
घाटियों में हवा सुना जाती है 
उनींदी घास का मस्तक सहलाते हुए 

वही धुन जो सूर्य रश्मियाँ 
लहरों संग किलोल करती सुना जाती हैं 
उनके आँचल पर सलमा सितारें सजाते हुए 

लहराती हमारे इर्द-गिर्द 
तमाम शोरो-गुल के बीच 
आस भरे नयनों से ताकती रहती हैं 
अक्सर ये मासूम तस्वीरें 
हमारी ओर 

पर कब तक 
इन तस्वीरों की आवाज़ अनसुनी करते रहेंगे 
आखिर कब तक ?



_________________________



*स्कूल से पढने के बाद दोपहरी में सब्जी बेचता बच्चा

हाँ, मेरे आका  
मेरी मटमैली आँखों में
बेशक आज तुम्हारे से रेशमी ख्वाब नही
आँधियों, बारिशों और
चटखती धूप से सख्त हुए कुछ बीज हैं महज

पर देखना  
एक रोज फूट ही पड़ेंगे
असंख्य कुल्ले
छलछला उठी असंख्य स्वेद बूंदों की नमी से,
धधकते मेरे तलवों के ताप से

देखना
मैं एक रोज हासिल कर ही लूंगा
अपने लिए
अपनी मेहनत से
अपने हिस्से की सब्ज जमीन 
तुम्हारी गगन चुम्बी
संगमरमरी अट्टालिकाओं के ठीक सामने



__________________________





   



*जब तक  

जब तक बोलता रहा
और मौन हो सुनता रहा

तब तक
आसमान बना रहा ठीक अपनी जगह
सूरज भी उगता रहा
हर रोज
ठीक उसी ऊंची इमारत के पीछे से
लय गति ताल में बढ़ रहीं थीं नदियाँ
            
पर ज्यों ही
गूंज उठी थी आवाज़
ब की
थर्रा उठी थीं इमारतें
बेसुरी बेढब हो गयीं थीं नदियाँ
यहाँ तक कि
पलक झपकते
उलट चुका था सिरे से
अ के लिए सब कुछ

और अब समझ चुके थे दोनों
आवाज़ की एक प्रत्यंचा खीचने भर से
गिराई जा सकती थीं अभेद्य दीवारें किले की
और हो सकती है शुरुआत


___________________________

*कह दो अंधेरों से

शेष रहे
थोड़ी सी कहीं चिंगारी
गोकि
शाख से जुड़े रहने की
रस्म निभाने की आदत नही
कुछ पत्तों की

धुंधलके भरी ऎसी ही इक भोर में
ढूंढते रौशनी की किरन
यकीन है मुझे कि
इकट्ठे होंगे जरूर
इसी आस में अकुलाते
शाख से कुछ टूटे पत्ते

बना कर स्वयम को समिधा
प्रजवल्लित करेंगे
विशाल तेजपुंज
और दमक उठेंगे
स्वर्णिम आभा से
म्लान सभी कृश काय मुख

कह दो अंधेरो से कि
अब उजाले बहुत दूर नही...

_________________





कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें