शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

यह
वह प्रेम है
जिसकी इफरात के वावजूद
नफरत से ही अटी दिखती है सारी कायनात

यह
वह प्रेम है
जो जमीं में दब अंकुरित होने का दर्द
झेलने के वजाय पलक झपकते ही बन जाता है
गुंचों वाला एक खूबसूरत शज़र

यह
वह प्रेम है
जो आखिरी साँसे भरते अपने कुछ निशानों पर
बिछा देगा अपने ही हाथों
तारकोल की स्याह परत

यह
वह प्रेम है
जब प्रेमलफ्ज़ आते ही
उसकी अपनी ही जुबां पर
फूट पड़ेगे एक रोज़ हरहरा कर अनगिनत छाले

ओ पग्गल !
यह वह प्रेम नहीं
यह प्रेम की धुन को बेसुरा बनाते हुए
प्रेम को इस जहां से
अलविदा कहने की एक साज़िश भर


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*प्रेम 
क्या होते हैं प्रेम में हम
 
 रेशमी कीड़े की तरह जब
बुन लेते हैं इर्द गिर्द अपने
एक खूबसूरत कूकून ?

 क्या होते हैं प्रेम में हम
सीख लेते है बखूबी जब
सफ़ेद रंग को प्रिज्म से सतरंगा देखना
सिर्फ खुद को खुशियाँ देने के लिये ?

 क्या होते हैं प्रेम में हम
आँखे मूंदे पलकों की कोरों में मुस्कुराते
खोल रहे होते हैं आहिस्ते किताब के
मुड़े तुडे कोने, हकीकत की जमीं से दूर ?
   
शायद अपने सिवाय 
 हम कभी नहीं होते किसी के प्रेम में ....  



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*  तुम्हें ऊब नही होती कभी?

सुनते हुए भी
तुम अनसुना कर देते हो अक्सर
मेरे अल्फाज़

अनझिप आँखों से
नापता रहते हो होठो से सरकते 
हर एक हर्फ

चुप्पी ओढ़ इंतजार करते हो ज्यों
शक्लें अख्तियार करते लफ़्ज़ों में
अपने अनगिनत सवालों के जवाब

और मन मुताबिक तवज्ज़ो न मिलने पर
फितरत से मजबूर झुंझला कर
कर देते हो उन्हें कतरनों में तब्दील

बखूबी अंदाजा था मुझे
अपने दायरे में सिमटे एक कारीगर के सिवाय
तुम और कुछ भी नही

अफ़सोस जिसे तराशने के नाम पर
आता है सिर्फ़ रेशमी दोशाले में सुइयां चुभोना
सहेजने का उसे सलीका ही नही

पर दिन ओ रात यूँ
एक ही आदत के साथ जिंदगी गुजारते
तुम्हे ऊब नहीं होती कभी ?


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