यह
वह प्रेम है
जिसकी इफरात के वावजूद
नफरत से ही अटी दिखती है सारी कायनात
यह
वह प्रेम है
जो जमीं में दब अंकुरित होने का दर्द
झेलने के वजाय पलक झपकते ही बन जाता है
गुंचों वाला एक खूबसूरत शज़र
यह
वह प्रेम है
जो आखिरी साँसे भरते अपने कुछ निशानों पर
बिछा देगा अपने ही हाथों
तारकोल की स्याह परत
यह
वह प्रेम है
जब “प्रेम” लफ्ज़ आते ही
उसकी अपनी ही जुबां पर
फूट पड़ेगे एक रोज़ हरहरा कर अनगिनत छाले
ओ पग्गल !
यह वह प्रेम नहीं
यह प्रेम की धुन को बेसुरा बनाते हुए
प्रेम को इस जहां से
अलविदा कहने की एक साज़िश भर
वह प्रेम है
जिसकी इफरात के वावजूद
नफरत से ही अटी दिखती है सारी कायनात
यह
वह प्रेम है
जो जमीं में दब अंकुरित होने का दर्द
झेलने के वजाय पलक झपकते ही बन जाता है
गुंचों वाला एक खूबसूरत शज़र
यह
वह प्रेम है
जो आखिरी साँसे भरते अपने कुछ निशानों पर
बिछा देगा अपने ही हाथों
तारकोल की स्याह परत
यह
वह प्रेम है
जब “प्रेम” लफ्ज़ आते ही
उसकी अपनी ही जुबां पर
फूट पड़ेगे एक रोज़ हरहरा कर अनगिनत छाले
ओ पग्गल !
यह वह प्रेम नहीं
यह प्रेम की धुन को बेसुरा बनाते हुए
प्रेम को इस जहां से
अलविदा कहने की एक साज़िश भर
______________________________
*प्रेम
क्या होते हैं प्रेम में हम
*प्रेम
क्या होते हैं प्रेम में हम
रेशमी
कीड़े की तरह जब
बुन लेते हैं इर्द गिर्द अपने
एक खूबसूरत कूकून ?
बुन लेते हैं इर्द गिर्द अपने
एक खूबसूरत कूकून ?
क्या
होते हैं प्रेम में हम
सीख लेते है बखूबी जब
सफ़ेद रंग को प्रिज्म से सतरंगा देखना
सिर्फ खुद को खुशियाँ देने के लिये ?
सीख लेते है बखूबी जब
सफ़ेद रंग को प्रिज्म से सतरंगा देखना
सिर्फ खुद को खुशियाँ देने के लिये ?
क्या
होते हैं प्रेम में हम
आँखे मूंदे पलकों की कोरों में मुस्कुराते
खोल रहे होते हैं आहिस्ते किताब के
मुड़े तुडे कोने, हकीकत की जमीं से दूर ?
आँखे मूंदे पलकों की कोरों में मुस्कुराते
खोल रहे होते हैं आहिस्ते किताब के
मुड़े तुडे कोने, हकीकत की जमीं से दूर ?
शायद अपने सिवाय
हम कभी नहीं होते किसी के
प्रेम में ....
____________________________
* तुम्हें ऊब नही होती कभी?
सुनते हुए भी
तुम अनसुना कर देते हो अक्सर
मेरे अल्फाज़
अनझिप आँखों से
नापता रहते हो होठो से सरकते
हर एक हर्फ
चुप्पी ओढ़ इंतजार करते हो ज्यों
शक्लें अख्तियार करते लफ़्ज़ों में
अपने अनगिनत सवालों के जवाब
और मन मुताबिक तवज्ज़ो न मिलने पर
फितरत से मजबूर झुंझला कर
कर देते हो उन्हें कतरनों में तब्दील
बखूबी अंदाजा था मुझे
अपने दायरे में सिमटे एक कारीगर के सिवाय
तुम और कुछ भी नही
अफ़सोस जिसे तराशने के नाम पर
आता है सिर्फ़ रेशमी दोशाले में सुइयां चुभोना
सहेजने का उसे सलीका ही नही
पर दिन ओ रात यूँ
एक ही आदत के साथ जिंदगी गुजारते
तुम्हे ऊब नहीं होती कभी ?
* तुम्हें ऊब नही होती कभी?
सुनते हुए भी
तुम अनसुना कर देते हो अक्सर
मेरे अल्फाज़
अनझिप आँखों से
नापता रहते हो होठो से सरकते
हर एक हर्फ
चुप्पी ओढ़ इंतजार करते हो ज्यों
शक्लें अख्तियार करते लफ़्ज़ों में
अपने अनगिनत सवालों के जवाब
और मन मुताबिक तवज्ज़ो न मिलने पर
फितरत से मजबूर झुंझला कर
कर देते हो उन्हें कतरनों में तब्दील
बखूबी अंदाजा था मुझे
अपने दायरे में सिमटे एक कारीगर के सिवाय
तुम और कुछ भी नही
अफ़सोस जिसे तराशने के नाम पर
आता है सिर्फ़ रेशमी दोशाले में सुइयां चुभोना
सहेजने का उसे सलीका ही नही
पर दिन ओ रात यूँ
एक ही आदत के साथ जिंदगी गुजारते
तुम्हे ऊब नहीं होती कभी ?
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें