*जब
हुलस कर
बह उठती है
एक मीठी नदी
जब
पुल बन जाती है
माँ
पिता और बच्चे के बीच
पुल बन जाती है
माँ
पिता और बच्चे के बीच
हरिया उठता है
उपवन
रेतीले किनारों पर
उपवन
रेतीले किनारों पर
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*यादों के गुंचे
जमीं में दबी हुई जड़ें !
खुली हवा में ना जी पाने का
जमीं में दबी हुई जड़ें !
खुली हवा में ना जी पाने का
बादलों के जब मर्जी आये
बरस जाने का
पत्तियों के बूँदें ढुलका देने का
शिकवा नही करती कभी
आँखें मूंदे वे जब भी याद करती हैं
गए दिनों की बारिशें
हौले से टांक देती है
अपनी शाख पर
एक और शोख नरम पत्ती
यादों के गुंचे हरी पत्तियों की शक्ल में
नज़र आते हैं शाखों पर...
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दिन ढले
ज्यादा देर बैठूं छत पर
तो परली दीवार पर
सुर्ख हो उठते हैं
बरसों पहले ईंट से खिंचे
विकट के तीनों निशान
ज्यादा देर बैठूं छत पर
तो परली दीवार पर
सुर्ख हो उठते हैं
बरसों पहले ईंट से खिंचे
विकट के तीनों निशान
‘नही भैया
ये आउट नही माना जाएगा
लाइन के बाहर थी गेंद’
सुनाई दे उठती हैं आवाजें
‘और देख, ये रहा शॉट’
ये आउट नही माना जाएगा
लाइन के बाहर थी गेंद’
सुनाई दे उठती हैं आवाजें
‘और देख, ये रहा शॉट’
गेंद आकर
सीधे मेरे माथे से टकराती है
पीड़ा इतनी कि
छलछला उठती हैं आँखें
सहलाते हुए माथा देखती हूँ सामने
कि उभर आया है आसमान के माथे पर भी
ताज़ी चोट का इक सुर्ख लाल निशान
सीधे मेरे माथे से टकराती है
पीड़ा इतनी कि
छलछला उठती हैं आँखें
सहलाते हुए माथा देखती हूँ सामने
कि उभर आया है आसमान के माथे पर भी
ताज़ी चोट का इक सुर्ख लाल निशान
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*कहो तो
कहो तो
क्यों लौट लौट
आती हो तुम, यादें
!
दिन ढले घर आये
बच्चे सी
सांझ की गलबहिया डाल
स्नेह से माथा चूमती
ममतामयी तुम!
जानती हो
खीच कर बढ़ाया वक्त
इलास्टिक की
तरह
वहीँ का वहीँ आ
ठहरता है
जब बूंदों की
अठखेलियाँ करते ही
कागज की कश्तियों
में
सैर पर निकल पड़ती
थीं मासूम खिलखिलाहटें
जब इन्द्रधनुष आसमान
में नही
नन्ही आँखों में झाँका
करते थे
पर बारिशों में वही बूँदें
मंजीरे नही बजाती अब
गिरती है
गिरती है
पक्के फर्शों पर
पनीली आँखों से
शिकायतें करती हुईं
यादों की बारिशों में
छई-छपाक करता मन
पनीली आँखों से
शिकायतें करती हुईं
यादों की बारिशों में
छई-छपाक करता मन
भींगे परों वाले पंछी सा गुमसुम
धूप के टुकड़े की भी अनदेखी कर बैठता है अब
धूप के टुकड़े की भी अनदेखी कर बैठता है अब
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*बेरुखी
हर रोज़
खुशी से लचकती
खिलखिलाती पत्तियों को
आज़ ढलके काँधे और
अनझिप आँखों से इकटक ताकते
किसी सोच में गुमसुम पाया
हो न हो
जरूर अनदेखा कर
अनमनी सी गुजरी होगी
हवा
नज़दीक से अभी
बेरुखी !
हथेली में रखे उस पासे की तरह
जिसके हर ओर लिखी होती है
काले बिंदुओं से
सिर्फ़ उदासी !!!
हर रोज़
खुशी से लचकती
खिलखिलाती पत्तियों को
आज़ ढलके काँधे और
अनझिप आँखों से इकटक ताकते
किसी सोच में गुमसुम पाया
हो न हो
जरूर अनदेखा कर
अनमनी सी गुजरी होगी
हवा
नज़दीक से अभी
बेरुखी !
हथेली में रखे उस पासे की तरह
जिसके हर ओर लिखी होती है
काले बिंदुओं से
सिर्फ़ उदासी !!!
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