*इन दिनों
परेशान है इन दिनों
उलटे पैरों वाला शैतान ..
चबाता रहता है मायूसी से
नींद में भी अपना निचला होंठ ...
क्योंकि नहीं खौफ रहा उसका अब धरती पर कोई !
उलटे पैरों वाला शैतान ..
चबाता रहता है मायूसी से
नींद में भी अपना निचला होंठ ...
क्योंकि नहीं खौफ रहा उसका अब धरती पर कोई !
दे दी है पटखनी
कुछ सीधे पैरों वाले इंसानों ने
इस आखिरी मुकाबले में भी उसे ..
कुछ सीधे पैरों वाले इंसानों ने
इस आखिरी मुकाबले में भी उसे ..
बेबस हो जब-तब
दांतों से चबा उठता है नाखून अपने
उफ़ कि नहीं पहचान सकता
चेहरा अपने उस्ताद का ...
दांतों से चबा उठता है नाखून अपने
उफ़ कि नहीं पहचान सकता
चेहरा अपने उस्ताद का ...
और आखिर आजिज़ आ
मुक़र्रर कर ली है सज़ा
उसने खुद अपने लिए ..
मुक़र्रर कर ली है सज़ा
उसने खुद अपने लिए ..
कुछ सफेदपोशो के दरबार में अब
हर सुबह ओ शाम
सिर झुकाकर ठोंकता है सलाम ...
हर सुबह ओ शाम
सिर झुकाकर ठोंकता है सलाम ...
*हो न हो
शब्दों के ताने बाने में
कुशलता से बुनी गयी वेदना
सहानुभूति / श्रद्धा / प्रेम / क्रांति / और बदलाव
उफ़ मानो उपज आये हों
अंतडियो में
नुकीले कई दांत ...
कुतरते हुए दीवारे
आखिर चुन ही डालेंगे जरूर
हमारी सम्पूर्ण मज्जा भी
एक न एक दिन
फिर पहचाने जा सकेंगे सहज ही
खोखली हड्डियों वाले
खडखडाते शरीर दूर ही से
और हो न हो
आज के मुकाबले
कहीं सुन्दर और बेहतर होगा
शब्दों के ताने बाने में
कुशलता से बुनी गयी वेदना
सहानुभूति / श्रद्धा / प्रेम / क्रांति / और बदलाव
उफ़ मानो उपज आये हों
अंतडियो में
नुकीले कई दांत ...
कुतरते हुए दीवारे
आखिर चुन ही डालेंगे जरूर
हमारी सम्पूर्ण मज्जा भी
एक न एक दिन
फिर पहचाने जा सकेंगे सहज ही
खोखली हड्डियों वाले
खडखडाते शरीर दूर ही से
और हो न हो
आज के मुकाबले
कहीं सुन्दर और बेहतर होगा
वह दिन !!
{ शब्दों और व्यवहार के फासले से क्षुब्ध कविता }
{ शब्दों और व्यवहार के फासले से क्षुब्ध कविता }
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*आज नही तो कल
आज नहीं तो कल
वे बना देंगे तुम्हारे शहर को भी
दादरी और बनारस!
इतनी हैरत से मत देखो
तुमसे, हाँ, तुम्हीं से मुखातिब हूँ मैं
क्योंकि
मचानों पर बैठकर
देख लिया है उन्होंने तुम्हारा सिरफिरापन
किस आसानी से
बना लेते हो धूर्त पाखंडियों को
तुम अपना ईश्वर
भेंट स्वरुप अर्पित कर देते हो
उनके कदमों में
अपना विवेक
जानते हैं वे
उनकी ‘हुआ-हुआ’ सुनते ही
मुंह उठाये भाग उठोगे तुम
बल्लम और लाठियां लेकर
उनकी फरेबी बातों में आकर
रंग डालोगे अपनी माटी को
अपने ही साथियों के रक्त से
और फूंक डालोगे अपने ही हाथों
एक रोज तुम अपना वतन
_____________________
सभाएं + प्रलोभन + तुम = ?
ये क्या
तुम बन जाते हो उस
भीड़ का हिस्सा
जो इकट्ठी की जाती
है
प्रलोभनों की मीठी
गोलियाँ देकर
यह जानते हुए भी
कि सिर पर ताज चिपक
जाने के बाद
वे भूल जायेंगे
तुम्हे तहखाने में पड़े कबाड़ की तरह
यह जानते हुए भी
सिर्फ भीड़ इकट्ठी कर
मंच पर ललकार भरने से
उन्हें मिल जाएगा
लायसेंस
निर्द्वंद खूनी होली
खेलने का
तमाम शहरों को आग
में झोंक देने का
यह जानते हुए भी
वे तुम्हारे सीने पर
देखना चाहते हैं हमेशा
मुसीबतों को ताबीज
की तरह लटकते हुए
कि तुम्हें भर पेट
रोटी खाते देख
हो जाती है हरारत
उन्हें
यह जानते हुए भी
कि तुम्हारे अश्रु
नीर में ही
खिलते हैं सपनों के
कंवल उनके
फिर आखिर क्यों
बन ही जाते हो उस
भीड़ का हिस्सा तुम ?
__________________________________
* फिर भी क्योंकि ..
जानता है राजा
कल फिसल भी गयी
तो लौट-फिर कर एक रोज़
उसी के हाथ आएगी राजगद्दी
कल फिसल भी गयी
तो लौट-फिर कर एक रोज़
उसी के हाथ आएगी राजगद्दी
कि मुद्दे नही होंगे
तो नही होगी राजगद्दी भी
तो कभी बस्तियों में कभी सीमाओं पर
मुर्गों की लड़ाई आयोजित करवाता रहता है राजा
तो नही होगी राजगद्दी भी
तो कभी बस्तियों में कभी सीमाओं पर
मुर्गों की लड़ाई आयोजित करवाता रहता है राजा
जानता है राजा
उसके राज में हो रहे खुलकर उत्पात
आवाज उठाने वाले
रौंद दिये जायेंगे बेरहमी से
पालतू पागल हाथियों के पाँव तले
उसके राज में हो रहे खुलकर उत्पात
आवाज उठाने वाले
रौंद दिये जायेंगे बेरहमी से
पालतू पागल हाथियों के पाँव तले
दरबान की नौकरी
और कतार में एक से एक विद्वान ?
जानता है राजा
पूरी तरह विफल हो चुकी हैं उसकी नीतियां
और कतार में एक से एक विद्वान ?
जानता है राजा
पूरी तरह विफल हो चुकी हैं उसकी नीतियां
जानता है राजा
आज कटघरे में है वह
फिर भी क्योंकि
घूमफिर कर उसी के पास
आनी है राजगद्दी
आज कटघरे में है वह
फिर भी क्योंकि
घूमफिर कर उसी के पास
आनी है राजगद्दी
______________________
*नेता जी कहिन
*नेता जी कहिन
अरे भाई!
अगर बाढ़
आपन संग ले भी गयी
तोहार टीन टम्बर
चार ठो बरतन औउर कपरा लत्ता
तो इतना हो हल्ला काहे भईया
अगर बाढ़
आपन संग ले भी गयी
तोहार टीन टम्बर
चार ठो बरतन औउर कपरा लत्ता
तो इतना हो हल्ला काहे भईया
अरे तो अब फिर लगा ले
इहाँ चार ठो बल्ली
तान ले चदरिया औ का
ले बन गयी तोहार गिरिस्थी
एतना हाय-हाय मत करो रे
ए पिछले जनम के पुन्य हैं तोहार
साक्षात गंगा मईया आयीं रहीं
तोहार दुआर
समझा की नाही?
इहाँ चार ठो बल्ली
तान ले चदरिया औ का
ले बन गयी तोहार गिरिस्थी
एतना हाय-हाय मत करो रे
ए पिछले जनम के पुन्य हैं तोहार
साक्षात गंगा मईया आयीं रहीं
तोहार दुआर
समझा की नाही?
अऊर फिर
तू तौ हिम्मती है रे
जानत तौ है आपन पीठ पर
दरिद्दर दुःख तकलीफ मौसम की मार
औउर मरी हुई बीबी लरिका बच्चा ढोना
ई में नवा का है रे तोहार वास्ते
कछू पल्ले पड़ा कि नाही?
तू तौ हिम्मती है रे
जानत तौ है आपन पीठ पर
दरिद्दर दुःख तकलीफ मौसम की मार
औउर मरी हुई बीबी लरिका बच्चा ढोना
ई में नवा का है रे तोहार वास्ते
कछू पल्ले पड़ा कि नाही?
चलो रे चलो’
और नेता जी के
हेलिकोप्टर में सवार होते ही
कैमरे की बत्तियों के साथ
बुझ गयीं थीं उम्मीदें भी
और नेता जी के
हेलिकोप्टर में सवार होते ही
कैमरे की बत्तियों के साथ
बुझ गयीं थीं उम्मीदें भी
बढ़ उठी थी हवा में दुर्गन्ध
लहरें शायद फिर कोई मृत पशु
छोड़ गयीं थीं किनारों पर
पांवों से आ लिपट गया था
किसी बच्चे का झबला
लहरें शायद फिर कोई मृत पशु
छोड़ गयीं थीं किनारों पर
पांवों से आ लिपट गया था
किसी बच्चे का झबला
हर ओर घुप्प अँधेरा था
क्योंकि अँधेरे में देखने के लिए
जरूरी था अँधेरा होना
तो अब दिखने लगा था साफ़
कि नदी नाले ही नही
संवेदनाएं भी बह रहीं थीं
खतरे के निशान से कहीं ऊपर
बहुत ऊपर ................
क्योंकि अँधेरे में देखने के लिए
जरूरी था अँधेरा होना
तो अब दिखने लगा था साफ़
कि नदी नाले ही नही
संवेदनाएं भी बह रहीं थीं
खतरे के निशान से कहीं ऊपर
बहुत ऊपर ................
_________________________
नही-नही
छोटी-छोटी बातों पर
छलक आते
मेरी आँखों के पानी को
मैं नही
हवाएं ले उड़ीं
छोटी-छोटी बातों पर
छलक आते
मेरी आँखों के पानी को
मैं नही
हवाएं ले उड़ीं
ले उड़ीं वे
माथे के ठीक बीचो-बीच
टिप-टिप कर लगातार गिरती
पागल कर देने वाली
संवेदनाओं की बूंदों को
माथे के ठीक बीचो-बीच
टिप-टिप कर लगातार गिरती
पागल कर देने वाली
संवेदनाओं की बूंदों को
ले उड़ीं थीं वे
दिलो-दिमाग को धिक्कारती
सही-गलत पाप-पुन्य की कशमकश में उलझी
मेरी नाज़ुक सोच को
दिलो-दिमाग को धिक्कारती
सही-गलत पाप-पुन्य की कशमकश में उलझी
मेरी नाज़ुक सोच को
और होते-होते
मैं हो उठा गज़ब का हल्का
अब ले जाए
जो भी जिधर भी मुझे
मैं हो उठा गज़ब का हल्का
अब ले जाए
जो भी जिधर भी मुझे
बेधड़क
बेफिक्र जा पड़ता हूँ
कहीं भी
खाइयों में दलदल में
यहाँ तक कि
बेफिक्र जा पड़ता हूँ
कहीं भी
खाइयों में दलदल में
यहाँ तक कि
______________________
राज सिंहासन पाने के लिए
वे दौड पड़े हैं उन्मत्त हाथियों की तरह
सुनहला राज सिंहासन पाने के लिए
न सिर्फ रौंदते हुए घास और उड़ाते हुए धूल
देखो वे सूंड में दबा कर गरदनें
पटक-पटक अधमरी कर रहे इंसानियत
वे रातो-रात निकलते हैं बिलों से
बड़ी-बड़ी पूँछ वाले चूहों की तरह
और चट कर रहे हैं बहुत होशियारी से
लहलहाती फसल के साथ तुम्हारा विवेक भी
सत्ता के इन पिपासुओं ने
ज़हरीले कर दिये हैं गिनती के रह गए मीठे सरोवर
घोल दिया है शरद की हवाओं में
जले हुए टायरों का दमघोंटू धुंआ
सभ्य से नज़र आते वे
मंच पर कस रहे हैं फब्तियां
विदूषकों की तरह खींच रहे हैं एक दूजे की टोपियां
पाने के लिए राज सिंहासन
वे शैतान से भी मिला रहे हैं हाथ
कर रहे हैं दागदार अपना स्वर्णिम इतिहास
_______________________________
*चुनाव
*चुनाव
खूब चहल पहल है
इन दिनों
दूर दराज के पोखरों,
कालिख से भरी छोटी-बड़ी नदियों के समीप
इन दिनों
दूर दराज के पोखरों,
कालिख से भरी छोटी-बड़ी नदियों के समीप
रहरह कर उठते गगनभेदी नारों से,
काफिलों से, चमचमाती रौशनियों से
और, न जाने किस इबारत में लिखे
उड़ते रंग-बिरंगे पतंगी कागज़ों से
अट गया हैं मटमैला पानी
काफिलों से, चमचमाती रौशनियों से
और, न जाने किस इबारत में लिखे
उड़ते रंग-बिरंगे पतंगी कागज़ों से
अट गया हैं मटमैला पानी
चर्र-मर्र की आवाजें करते
झक्क सफ़ेद वस्त्र पहने
सधे हुए उन हाथों से उछाले गए
कुछ लुभावने आभासी इन्द्र धनुषीय टुकड़ों को
लपकने में बखूबी उलझा दिया गया है
यहाँ की सभी मछलियों को
झक्क सफ़ेद वस्त्र पहने
सधे हुए उन हाथों से उछाले गए
कुछ लुभावने आभासी इन्द्र धनुषीय टुकड़ों को
लपकने में बखूबी उलझा दिया गया है
यहाँ की सभी मछलियों को
कचरे,
बेख़ौफ़ बहते नालों का जहर पीने को मजबूर,
वे अबुध भोले जलचर
उस अचनाक हुई वृष्टि को जब तक
समझने का प्रयास करेंगें
तब तक इतिहास के पन्नों में
काले अक्षरों में दर्ज़ हो चुकी होगी
एक और फतह
बेख़ौफ़ बहते नालों का जहर पीने को मजबूर,
वे अबुध भोले जलचर
उस अचनाक हुई वृष्टि को जब तक
समझने का प्रयास करेंगें
तब तक इतिहास के पन्नों में
काले अक्षरों में दर्ज़ हो चुकी होगी
एक और फतह
फतह, मासूमियत पर शातिरपन की,
फतह, दिवा स्वप्न की भूल भुलैया में
झोंक देने वालों की,
फतह, मछलियों को
सुनहले रेशमी जाल में फांस कर
फिर से उसी गंदले पानी में फेंक
तड़पते रहने को मजबूर कर देने वालों की...
फतह, दिवा स्वप्न की भूल भुलैया में
झोंक देने वालों की,
फतह, मछलियों को
सुनहले रेशमी जाल में फांस कर
फिर से उसी गंदले पानी में फेंक
तड़पते रहने को मजबूर कर देने वालों की...
बहुत ही शानदार कवितायेँ ..
जवाब देंहटाएंशुक्रिया भाई
हटाएंसुंदर!
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया
हटाएंउम्मीद करती हूँ कि समय-समय पर आप आगे भी मेरा मार्ग दर्शन करते रहेंगे
हटाएंबधाई लें। अच्छा काम। बाद में समय निकाल कर पढ़ता हूंं।
जवाब देंहटाएंशुक्रिया सर, आपकी बहुमूल्य टिप्पणी का इंतजार रहेगा मुझे
हटाएंबहुत अच्छी कविताओं का संकलन
जवाब देंहटाएंबधाई और शुभकामनायें :)
बहुत शुक्रिया मित्र
हटाएंबहुत ही धारदार मानीख़ेज़ अभिव्यक्ति। आज के युग की बदलती तस्वीर को, लोगों के बदलते चेहरों को, खो गए जीवन मूल्यों को आईना दिखाती तुम्हारी कविताएं बहुत ज़रूरी थीं ये जानने के लिए कि अब हम कैसे दिखने लगे हैं; क्योंकि जान लेने से बदलाव की एक उम्मीद बंधी रहती है। सचमुच बहुत ही सूक्ष्म और गहन अभिव्यक्ति ... कई कई स्तरों, कई कई परतों में खुलते हैं हर पंक्ति के अर्थ। बार बार पढ़ने को बाध्य करते हैं।
जवाब देंहटाएंइस संकलन के लिए बहुत बधाई।
दी, बहुमूल्य हर एक शब्द के लिए हृदय से आभारी हूँ. आपने हमेशा मेरा उत्साह बढाया है मेरा माग दर्शन किया है. ब्लॉग पर आने के लिए सराहना के लिए बहुत शुक्रिया दी
हटाएंअच्छी रचनाएँ , बधाई
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया मीता जी
हटाएंनीता
जवाब देंहटाएंकविताएँ पढ़ी.अच्छी लगी.
वर्तमान सत्ताकामियेों की चाल,चरित्र,चेहरे की खूब खबर ली है आपने.
राजनैतिक पाखण्ड को सही उकेरा है.
बहुत शुक्रिया जसबीर जी
हटाएंबहुत अच्छी कविताओं का संकलन
जवाब देंहटाएंबधाई और शुभकामनायें
बेटू थैंक्स :)
हटाएं